Friday, October 27, 2017
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|| रोचक जानकारी || Ultimate Logic
Useful information about Internet.
इंटरनेट के बारे में उपयोगी जानकारी|
1. You can use Google as a Timer by Typing " Set timer (x) minutes " into a search bar.
आप search bar में " Set timer (x) minutes " लिखकर एक टाइमर के रूप में गूगल का उपयोग कर सकते हैं।
2. You can download Youtube videos by typing "ss" between www. and youtube in URLs.
आप URL में www. और youtube के बीच "ss" टाइप करके Youtube वीडियो डाउनलोड कर सकते हैं।
3. If you lost your Android phone in your house and it's on vibrate, You can find it by going to Google play >Android Device Manager>Ring. It will rang for five minutes in full volume.
यदि आपने अपने एंड्रॉइड फोन को अपने घर में खो दिया है और यह Vibration पर है, तो आप इसे Google Play> Android Device Manager> Ring पर जाकर ढूँढ सकते हैं। यह full volume में पांच मिनट के लिए बजाएगा।
4. If You are in a hotel and Run Out of your Chargers, the TV usually has a USB plugin.
आप एक होटल में हैं और अपने चार्जर्स की दूर हैं, तो टीवी आम तौर पर एक यूएसबी प्लगइन है।
5. If you accidentally close a Tab, Press Ctrl+Shift+T to reopen it.
यदि आप गलती से एक टैब बंद कर देते हैं, तो उसे फिर से खोलने के लिए Ctrl + Shift + T दबाएं।
6. If your phone battery is low and you need it for later don't turn it off. Instead, put it on airplane mode. Turning it Off and on will waste battery life.
अगर आपकी फोन की बैटरी कम है और आपको बाद में इसकी ज़रूरत है तो इसे बंद न करें। इसके बजाय, इसे हवाई जहाज मोड पर रखें | इसे चालू करना बंद करना बैटरी को बर्बाद कर देगा।
7. For privacy of your sites history, Use Incognito Mode of your browsers.
Wednesday, September 6, 2017
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आओ पढ़ाई करे।
लिंग दो प्रकार के होते हैं -
पुल्लिंग
स्त्री लिंग
1. पुल्लिंग
जिसके द्वारा किसी शब्द की पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुल्लिंग कहते हैं।
जैसे - राम, काला, पहाड़, सोना।
2. स्त्रीलिंग
जिसके द्वारा किसी शब्द की स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं।
जैसे - सीमा, अध्यापिका, एकादशी, लता।
लिंग की पहचान
लिंग की पहचान शब्दों के व्यवहार से होती है।
तथ्य
जिन शब्दों के अन्त में आँ, एँ लगा सके वो स्त्री लिंग होगा। शेष सभी पुल्लिंग होंगे।
जिन शब्दों के अन्तिम व्यंजन पर बड़े ऊ व बड़ी ई कि मात्रा हो मुख्यतः स्त्री लिंग होते हैं।
पुलिंग
प्राणीवाचक पुल्लिंग
पुरूष, मनुष्य,लड़का,कौवा, उल्लू, खटमल,तोता,बाज,सांप,मेंढ़क,गैण्डा,कछुआ,पशु,बैल,कुत्ता।
अप्राणिवाचक पुल्लिंग
पर्वतों के नाम, महीनों के नाम, दिनों या वारों के नाम, ग्रहों के नाम, देशों के नाम, वृक्षों के नाम, अनाजों के नाम(अपवाद ज्वार), द्रव पदार्थों के नाम, समय सुचक नाम, देवताओं के नाम,धातुओं के नाम(अपवाद चांदी), समुद्रों के नाम मुख्य रूप से पुल्लिंग में आते हैं। इनके अलावा शरीर के अंगों के नाम भी पुल्लिंग में आते है लेकिन कुछ अपवाद स्वरूप(ठुडी, कोहनी, जीभ,गर्दन,अंगुली) भी हैं।
जैसे - भारत, सूर्य, सोना, नीम, बाजरा, पीतल, सोमवार, चैत्र, जुन, हिमालय।
स्त्रीलिंग
भाषाओं, बोलियों, लिपियों, तिथियों,नदियों,देवियों, महिलाओं के नाम, लताओं के नाम मुख्य रूप से स्त्रीलिंग में आते हैं।
जैसे - गंगा, देवनागरी, हिन्दी, एकादशी, दुर्गा, सीता, अमर बेल।
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लिंग
लिंग
लिंग शब्द का अर्थ होता है चिह्न या पहचान। व्याकरण के अन्तर्गत लिंग उसे कहते हैं, जिसके द्वारा किसी शब्द के स्त्री या पुरुष जाति का होने का बोध होता है।लिंग दो प्रकार के होते हैं -
पुल्लिंग
स्त्री लिंग
1. पुल्लिंग
जिसके द्वारा किसी शब्द की पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुल्लिंग कहते हैं।
जैसे - राम, काला, पहाड़, सोना।
2. स्त्रीलिंग
जिसके द्वारा किसी शब्द की स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं।
जैसे - सीमा, अध्यापिका, एकादशी, लता।
लिंग की पहचान
लिंग की पहचान शब्दों के व्यवहार से होती है।
तथ्य
जिन शब्दों के अन्त में आँ, एँ लगा सके वो स्त्री लिंग होगा। शेष सभी पुल्लिंग होंगे।
जिन शब्दों के अन्तिम व्यंजन पर बड़े ऊ व बड़ी ई कि मात्रा हो मुख्यतः स्त्री लिंग होते हैं।
पुलिंग
प्राणीवाचक पुल्लिंग
पुरूष, मनुष्य,लड़का,कौवा, उल्लू, खटमल,तोता,बाज,सांप,मेंढ़क,गैण्डा,कछुआ,पशु,बैल,कुत्ता।
अप्राणिवाचक पुल्लिंग
पर्वतों के नाम, महीनों के नाम, दिनों या वारों के नाम, ग्रहों के नाम, देशों के नाम, वृक्षों के नाम, अनाजों के नाम(अपवाद ज्वार), द्रव पदार्थों के नाम, समय सुचक नाम, देवताओं के नाम,धातुओं के नाम(अपवाद चांदी), समुद्रों के नाम मुख्य रूप से पुल्लिंग में आते हैं। इनके अलावा शरीर के अंगों के नाम भी पुल्लिंग में आते है लेकिन कुछ अपवाद स्वरूप(ठुडी, कोहनी, जीभ,गर्दन,अंगुली) भी हैं।
जैसे - भारत, सूर्य, सोना, नीम, बाजरा, पीतल, सोमवार, चैत्र, जुन, हिमालय।
स्त्रीलिंग
भाषाओं, बोलियों, लिपियों, तिथियों,नदियों,देवियों, महिलाओं के नाम, लताओं के नाम मुख्य रूप से स्त्रीलिंग में आते हैं।
जैसे - गंगा, देवनागरी, हिन्दी, एकादशी, दुर्गा, सीता, अमर बेल।
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आओ पढ़ाई करे।
अर्थात् व्याकरण में संज्ञा या सर्वनाम शब्द की वह अवस्था जिसके द्वारा वाक्य में उसका क्रिया के साथ संबंध प्रकट होता है। कारक यह इंगित करता है कि वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का काम क्या है। कारक कई रूपों में देखने को मिलता है-
शब्दों में विकार - जैसे 'लड़का' से 'लड़के' ; 'मैं' से 'मुझको', 'मेरा' आदि।
शब्दों के बाद कुछ शब्द आना - 'गाय को', 'वृक्ष से', 'राम का', 'पानी में',
अन्य रूप
कुछ भाषाओं में संज्ञा और सर्वनाम के अतिरिक्त विशेषण और क्रियाविशेषण (ऐडवर्ब) में भी विकार आते हैं। जैसे संस्कृत में - 'शीतलेन जलेन' में 'शीतलेन' विशेषण है।
विभिन्न भाषाओं में कारकों की संख्या तथा कारक के अनुसार शब्द का रूप-परिवर्तन भिन्न-भिन्न होता है। संस्कृत तथा अन्य प्राचीन भरतिय भाषाओं में आठ कारक होते हैं। जर्मन भाषा में चार कारक हैं।
कारक विभक्ति - संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के बाद ‘ने, को, से, के लिए’, आदि जो चिह्न लगते हैं वे चिह्न कारक 'विभक्ति' कहलाते हैं।
कारक के भेद[संपादित करें]
हिन्दी में आठ कारक होते हैं। उन्हें विभक्ति चिह्नों सहित नीचे देखा जा सकता है-
कारक -- विभक्ति चिह्न (परसर्ग)
1. कर्ता -- ने
2. कर्म -- को
3. करण -- से, के साथ, के द्वारा
4. संप्रदान -- के लिए, को
5. अपादान -- से (पृथक)
6. संबंध -- का, के, की
7. अधिकरण -- में, पर
8. संबोधन -- हे ! अरे ! ओ!
कारक चिह्न स्मरण करने के लिए इस पद की रचना की गई हैं-
कर्ता ने अरु कर्म को, करण रीति से जान।
संप्रदान को, के लिए, अपादान से मान।।
का, के, की, संबंध हैं, अधिकरणादिक में मान।
रे ! हे ! हो ! संबोधन, मित्र धरहु यह ध्यान।।
विशेष - कर्ता से अधिकरण तक विभक्ति चिह्न (परसर्ग) शब्दों के अंत में लगाए जाते हैं, किन्तु संबोधन कारक के चिह्न-हे, रे, आदि प्रायः शब्द से पूर्व लगाए जाते हैं।
कर्ता कारक
जिस रूप से क्रिया (कार्य) के करने वाले का बोध होता है वह ‘कर्ता’ कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘ने’ है। इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोग नहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है। जैसे- 1.राम ने रावण को मारा। 2.लड़की स्कूल जाती है।
पहले वाक्य में क्रिया का कर्ता राम है। इसमें ‘ने’ कर्ता कारक का विभक्ति-चिह्न है। इस वाक्य में ‘मारा’ भूतकाल की क्रिया है। ‘ने’ का प्रयोग प्रायः भूतकाल में होता है। दूसरे वाक्य में वर्तमानकाल की क्रिया का कर्ता लड़की है। इसमें ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग नहीं हुआ है।
विशेष-
(1) भूतकाल में अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ भी ने परसर्ग (विभक्ति चिह्न) नहीं लगता है। जैसे-वह हँसा।
(2) वर्तमानकाल व भविष्यतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है। जैसे-वह फल खाता है। वह फल खाएगा।
(3) कभी-कभी कर्ता के साथ ‘को’ तथा ‘स’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-
(अ) बालक को सो जाना चाहिए। (आ) सीता से पुस्तक पढ़ी गई।
(इ) रोगी से चला भी नहीं जाता। (ई) उससे शब्द लिखा नहीं गया।
कर्म कारक
क्रिया के कार्य का फल जिस पर पड़ता है, वह कर्म कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘को’ है। यह चिह्न भी बहुत-से स्थानों पर नहीं लगता। जैसे- 1. मोहन ने साँप को मारा। 2. लड़की ने पत्र लिखा। पहले वाक्य में ‘मारने’ की क्रिया का फल साँप पर पड़ा है। अतः साँप कर्म कारक है। इसके साथ परसर्ग ‘को’ लगा है। दूसरे वाक्य में ‘लिखने’ की क्रिया का फल पत्र पर पड़ा। अतः पत्र कर्म कारक है। इसमें कर्म कारक का विभक्ति चिह्न ‘को’ नहीं लगा।
करण कारक
संज्ञा आदि शब्दों के जिस रूप से क्रिया के करने के साधन का बोध हो अर्थात् जिसकी सहायता से कार्य संपन्न हो वह करण कारक कहलाता है। इसके विभक्ति-चिह्न ‘से’ के ‘द्वारा’ है। जैसे- 1.अर्जुन ने जयद्रथ को बाण से मारा। 2.बालक गेंद से खेल रहे है।
पहले वाक्य में कर्ता अर्जुन ने मारने का कार्य ‘बाण’ से किया। अतः ‘बाण से’ करण कारक है। दूसरे वाक्य में कर्ता बालक खेलने का कार्य ‘गेंद से’ कर रहे हैं। अतः ‘गेंद से’ करण कारक है।
संप्रदान कारक
संप्रदान का अर्थ है-देना। अर्थात कर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है, अथवा जिसे कुछ देता है उसे व्यक्त करने वाले रूप को संप्रदान कारक कहते हैं। इसके विभक्ति चिह्न ‘के लिए’ को हैं। 1.स्वास्थ्य के लिए सूर्य को नमस्कार करो। 2.गुरुजी को फल दो। इन दो वाक्यों में ‘स्वास्थ्य के लिए’ और ‘गुरुजी को’ संप्रदान कारक हैं।
अपादान कारक
संज्ञा के जिस रूप से एक वस्तु का दूसरी से अलग होना पाया जाए वह अपादान कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘से’ है। जैसे- 1.बच्चा छत से गिर पड़ा। 2.संगीता घोड़े से गिर पड़ी। इन दोनों वाक्यों में ‘छत से’ और घोड़े ‘से’ गिरने में अलग होना प्रकट होता है। अतः घोड़े से और छत से अपादान कारक हैं।
संबंध कारक
शब्द के जिस रूप से किसी एक वस्तु का दूसरी वस्तु से संबंध प्रकट हो वह संबंध कारक कहलाता है। इसका विभक्ति चिह्न ‘का’, ‘के’, ‘की’, ‘रा’, ‘रे’, ‘री’ है। जैसे- 1.यह राधेश्याम का बेटा है। 2.यह कमला की गाय है। इन दोनों वाक्यों में ‘राधेश्याम का बेटे’ से और ‘कमला का’ गाय से संबंध प्रकट हो रहा है। अतः यहाँ संबंध कारक है।
अधिकरण कारक
शब्द के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है उसे अधिकरण कारक कहते हैं। इसके विभक्ति-चिह्न ‘में’, ‘पर’ हैं। जैसे- 1.भँवरा फूलों पर मँडरा रहा है। 2.कमरे में टी.वी. रखा है। इन दोनों वाक्यों में ‘फूलों पर’ और ‘कमरे में’ अधिकरण कारक है।
संबोधन कारक
जिससे किसी को बुलाने अथवा सचेत करने का भाव प्रकट हो उसे संबोधन कारक कहते है और संबोधन चिह्न (!) लगाया जाता है। जैसे- 1.अरे भैया ! क्यों रो रहे हो ? 2.हे गोपाल ! यहाँ आओ। इन वाक्यों में ‘अरे भैया’ और ‘हे गोपाल’ ! संबोधन कारक है।
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कारक
कारक
व्याकरण के सन्दर्भ में, किसी वाक्य, मुहावरा या वाक्यांश में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ सम्बन्ध कारक कहलाता है।अर्थात् व्याकरण में संज्ञा या सर्वनाम शब्द की वह अवस्था जिसके द्वारा वाक्य में उसका क्रिया के साथ संबंध प्रकट होता है। कारक यह इंगित करता है कि वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का काम क्या है। कारक कई रूपों में देखने को मिलता है-
शब्दों में विकार - जैसे 'लड़का' से 'लड़के' ; 'मैं' से 'मुझको', 'मेरा' आदि।
शब्दों के बाद कुछ शब्द आना - 'गाय को', 'वृक्ष से', 'राम का', 'पानी में',
अन्य रूप
कुछ भाषाओं में संज्ञा और सर्वनाम के अतिरिक्त विशेषण और क्रियाविशेषण (ऐडवर्ब) में भी विकार आते हैं। जैसे संस्कृत में - 'शीतलेन जलेन' में 'शीतलेन' विशेषण है।
विभिन्न भाषाओं में कारकों की संख्या तथा कारक के अनुसार शब्द का रूप-परिवर्तन भिन्न-भिन्न होता है। संस्कृत तथा अन्य प्राचीन भरतिय भाषाओं में आठ कारक होते हैं। जर्मन भाषा में चार कारक हैं।
कारक विभक्ति - संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के बाद ‘ने, को, से, के लिए’, आदि जो चिह्न लगते हैं वे चिह्न कारक 'विभक्ति' कहलाते हैं।
कारक के भेद[संपादित करें]
हिन्दी में आठ कारक होते हैं। उन्हें विभक्ति चिह्नों सहित नीचे देखा जा सकता है-
कारक -- विभक्ति चिह्न (परसर्ग)
1. कर्ता -- ने
2. कर्म -- को
3. करण -- से, के साथ, के द्वारा
4. संप्रदान -- के लिए, को
5. अपादान -- से (पृथक)
6. संबंध -- का, के, की
7. अधिकरण -- में, पर
8. संबोधन -- हे ! अरे ! ओ!
कारक चिह्न स्मरण करने के लिए इस पद की रचना की गई हैं-
कर्ता ने अरु कर्म को, करण रीति से जान।
संप्रदान को, के लिए, अपादान से मान।।
का, के, की, संबंध हैं, अधिकरणादिक में मान।
रे ! हे ! हो ! संबोधन, मित्र धरहु यह ध्यान।।
विशेष - कर्ता से अधिकरण तक विभक्ति चिह्न (परसर्ग) शब्दों के अंत में लगाए जाते हैं, किन्तु संबोधन कारक के चिह्न-हे, रे, आदि प्रायः शब्द से पूर्व लगाए जाते हैं।
कर्ता कारक
जिस रूप से क्रिया (कार्य) के करने वाले का बोध होता है वह ‘कर्ता’ कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘ने’ है। इस ‘ने’ चिह्न का वर्तमानकाल और भविष्यकाल में प्रयोग नहीं होता है। इसका सकर्मक धातुओं के साथ भूतकाल में प्रयोग होता है। जैसे- 1.राम ने रावण को मारा। 2.लड़की स्कूल जाती है।
पहले वाक्य में क्रिया का कर्ता राम है। इसमें ‘ने’ कर्ता कारक का विभक्ति-चिह्न है। इस वाक्य में ‘मारा’ भूतकाल की क्रिया है। ‘ने’ का प्रयोग प्रायः भूतकाल में होता है। दूसरे वाक्य में वर्तमानकाल की क्रिया का कर्ता लड़की है। इसमें ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग नहीं हुआ है।
विशेष-
(1) भूतकाल में अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ भी ने परसर्ग (विभक्ति चिह्न) नहीं लगता है। जैसे-वह हँसा।
(2) वर्तमानकाल व भविष्यतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है। जैसे-वह फल खाता है। वह फल खाएगा।
(3) कभी-कभी कर्ता के साथ ‘को’ तथा ‘स’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-
(अ) बालक को सो जाना चाहिए। (आ) सीता से पुस्तक पढ़ी गई।
(इ) रोगी से चला भी नहीं जाता। (ई) उससे शब्द लिखा नहीं गया।
कर्म कारक
क्रिया के कार्य का फल जिस पर पड़ता है, वह कर्म कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘को’ है। यह चिह्न भी बहुत-से स्थानों पर नहीं लगता। जैसे- 1. मोहन ने साँप को मारा। 2. लड़की ने पत्र लिखा। पहले वाक्य में ‘मारने’ की क्रिया का फल साँप पर पड़ा है। अतः साँप कर्म कारक है। इसके साथ परसर्ग ‘को’ लगा है। दूसरे वाक्य में ‘लिखने’ की क्रिया का फल पत्र पर पड़ा। अतः पत्र कर्म कारक है। इसमें कर्म कारक का विभक्ति चिह्न ‘को’ नहीं लगा।
करण कारक
संज्ञा आदि शब्दों के जिस रूप से क्रिया के करने के साधन का बोध हो अर्थात् जिसकी सहायता से कार्य संपन्न हो वह करण कारक कहलाता है। इसके विभक्ति-चिह्न ‘से’ के ‘द्वारा’ है। जैसे- 1.अर्जुन ने जयद्रथ को बाण से मारा। 2.बालक गेंद से खेल रहे है।
पहले वाक्य में कर्ता अर्जुन ने मारने का कार्य ‘बाण’ से किया। अतः ‘बाण से’ करण कारक है। दूसरे वाक्य में कर्ता बालक खेलने का कार्य ‘गेंद से’ कर रहे हैं। अतः ‘गेंद से’ करण कारक है।
संप्रदान कारक
संप्रदान का अर्थ है-देना। अर्थात कर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है, अथवा जिसे कुछ देता है उसे व्यक्त करने वाले रूप को संप्रदान कारक कहते हैं। इसके विभक्ति चिह्न ‘के लिए’ को हैं। 1.स्वास्थ्य के लिए सूर्य को नमस्कार करो। 2.गुरुजी को फल दो। इन दो वाक्यों में ‘स्वास्थ्य के लिए’ और ‘गुरुजी को’ संप्रदान कारक हैं।
अपादान कारक
संज्ञा के जिस रूप से एक वस्तु का दूसरी से अलग होना पाया जाए वह अपादान कारक कहलाता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘से’ है। जैसे- 1.बच्चा छत से गिर पड़ा। 2.संगीता घोड़े से गिर पड़ी। इन दोनों वाक्यों में ‘छत से’ और घोड़े ‘से’ गिरने में अलग होना प्रकट होता है। अतः घोड़े से और छत से अपादान कारक हैं।
संबंध कारक
शब्द के जिस रूप से किसी एक वस्तु का दूसरी वस्तु से संबंध प्रकट हो वह संबंध कारक कहलाता है। इसका विभक्ति चिह्न ‘का’, ‘के’, ‘की’, ‘रा’, ‘रे’, ‘री’ है। जैसे- 1.यह राधेश्याम का बेटा है। 2.यह कमला की गाय है। इन दोनों वाक्यों में ‘राधेश्याम का बेटे’ से और ‘कमला का’ गाय से संबंध प्रकट हो रहा है। अतः यहाँ संबंध कारक है।
अधिकरण कारक
शब्द के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है उसे अधिकरण कारक कहते हैं। इसके विभक्ति-चिह्न ‘में’, ‘पर’ हैं। जैसे- 1.भँवरा फूलों पर मँडरा रहा है। 2.कमरे में टी.वी. रखा है। इन दोनों वाक्यों में ‘फूलों पर’ और ‘कमरे में’ अधिकरण कारक है।
संबोधन कारक
जिससे किसी को बुलाने अथवा सचेत करने का भाव प्रकट हो उसे संबोधन कारक कहते है और संबोधन चिह्न (!) लगाया जाता है। जैसे- 1.अरे भैया ! क्यों रो रहे हो ? 2.हे गोपाल ! यहाँ आओ। इन वाक्यों में ‘अरे भैया’ और ‘हे गोपाल’ ! संबोधन कारक है।
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आओ पढ़ाई करे।
जैसे - कैसे,कहां,कितना।
उदाहरण
निम्न में से अविकारी शब्द है-
1. कौन 2. कब 2. किसने 4. यह
उत्तर
क्योंकि कौन प्र.व.सर्वनाम व एक वचन कर्ता है जिस पर लिंग, कारक व वचन बदलने पर परिवर्तन होता है कब एक अव्यय है जिस पर लिंग, वचन या कारक के बदलने पर कोई प्रभाव नहीं होगा इसी प्रकार किसने प्र.व.सर्वनाम एक वचन कर्ता है और यह अ.प.सर्वनाम एक वचन कर्ता है।
अव्यय के मुख्य रूप से चार भेद होते हैं -
क्रिया विशेषण
संबंध बोधक
समुच्चय बोधक
विस्मयादि बोधक
अन्य भेदों में निपात व अव्ययीभाव समास के उदाहरण है।
1. क्रिया विशेषण
क्रिया शब्दों कि विशेषता प्रकट करने वाले शब्द क्रिया विशेषण कहलाते है क्रिया विशेषण के मुख्यतः चार भेद होत है।
1. रीति वाचक क्रि.वि - कैसे
2. स्थान वाचक क्रि.वि. - कहां
3. काल वााचक क्रि.वि. - कब
4. परिमाण वाचक क्रि.वि. - कितना
रीति वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्नवाचक अव्यय कैसे का प्रयोग करने पर जो क्रिया विशेषण उत्तर में आये उसे रिति वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - सुन्दर, अच्छा, मीठा, धीरे-धीरे,तेज।
उदाहरण - हमारे सामने शेर अचानक आ गया
यहां कैसे से प्रश्न करने पर शेर हमारे सामने कैसे आ गया। इसका उत्तर अचानक जो कि आ गया क्रिया की विशेषता बतलाता है अतः अचानक अव्यय है।
स्थान वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्नवाचक अव्यय कहां का प्रयोग करने पर उत्तर में जो क्रिया विशेषण शब्द आए उसे स्थान वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - यहां,वहां,सामने,ऊपर,निचे,दाएं,बाएं।
उदाहरण - आज मैं वहां जाऊंगा।
यहां कहां से प्रश्न करने पर आज तुम कहां जाओगे। इसका उत्तर वहां जो कि जाऊंगा क्रिया की विशेषता बतलाता है अतः वहां अव्यय है।
काल वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पहले प्रश्नवाचक अव्यय कब का प्रयोग करने पर उत्तर में जो शब्द आये वह काल वाचक क्रिया विशेषण होता है।
जैसे - कल,परसों,आज,सुबह,शाम,पहले बाद में।
उदाहरण - मोहन कल हनुमानगढ़ आयेगा।
यहां कब से प्रशन करने पर मोहन कब हनुमानगढ़ जायेगा। इसका उत्तर कल जो कि जायेगा क्रिया कि विशेषता है। अतः कल अव्यय है।
परिमाण वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्न वाचक अव्यय कितना का प्रयोग करने पर जो शब्द उत्तर में आये उसे परिमाण वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - कम,ज्यादा,अधिक,बहुत,थोड़ा।
उदाहरण - राम ने भोजन थोड़ा खाया है।
यहां कितना से प्रश्न करने पर राम ने कितना भोजन खाया। इसका उत्तर थोड़ा जो कि खाया क्रिया कि विशेषता है। अतः थोड़ा अव्यय है।
तथ्य
बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका प्रयोग विशेषण तथा क्रिया विशेषण दोनों के लिए हो जाता है
जैसे - कम,ज्यादा,अधिक,बहुत,थोड़ा,आधा पुरा,सुन्दर,अच्छा मिठा।
इन शब्दों का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के लिए हो तो इन्हें विशेषण माना जायेगा, तथा इनका प्रयोग क्रिया के लिए हो तो इन्हें क्रिया विशेषण माना जायेगा।
उदाहरण
मोर सुन्दर नाचा। मोर सुन्दर है।
पहले वाक्य में सुन्दर क्रिया विशेषण है जो कि नाचा क्रिया कि विशेषता बता रहा है, जबकि दुसरे वाक्य में सुन्दर विशेषण है जो कि मोर कि विशेषता बता रहा है।
जैसे वह आम कम(क्रि.वि.) खाता है। वह कम(वि.) आम खाता है।
जिस प्रकार विशेषण शब्दों की विशेषता प्रविशेषण कहलाती है उसी प्रकार क्रिया विशेषण शब्दों कि विशेषता प्रक्रियाविशेषण कहलाती है।
उदाहरण
उदाहरण मोर बहुत सुन्दर है। मोर बहुत सुन्दर नाचा।
यहां पहले वाक्य में बहुत, सुन्दर विशेषण कि विशेषत बता रहा है। अतः यह प्रविशेषण है। दुसरे वाक्य में बहुत, सुन्दर क्रियाविशेषण कि विशेषता बता रहा है। अतः यह प्रक्रियाविशेषण है।
2. संबंध बोधक अव्यय
वे अव्यय शब्द जिनका प्रयोग वाक्य में वाक्य में प्रयुक्त क्रिया या अन्य शब्दों के साथ जोड़ने के लिए किया जाता है। उन्हें संबंध बोधक कहते है।
बहुत से शब्दों का प्रयोग क्रिया वि. तथा संबंध बोधक दोनों में होता है। जैसे यहां, वहां, ऊपर, निचे, सामने, पहले, दायें, बाएं, बाद, कम, ज्यादा,अधिक बहुत आदि।इन शब्दों से पहले कारक चिन्ह का,के,कि,रा,रे,री,ना,ने,नी,से आ जाये तो इन्हें संबंध बोधक अव्यय माना जायेगा। तथा इनसे पहले ये कारक चिन्ह न आये तो इन्हें क्रि.वि. माना जायेगा।
जैसे - राम बाद में जायेगा।
यहां बाद क्रिया विशेषण है।
राम भोजन के बाद जायेगा।
यहां बाद संबंध बता रहा है।
3. समुच्य बोधक अव्यय
दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने या उनमें अलगाव(अलग होना) दिखाने वाले अव्यय समुच्च बोधक अव्यय कहलाते है।
ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं -
संयोजक
विभाजक
1. संयोजक - दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाले अव्यय संयोजक कहलाते है।
जैसे - कि,और,एवं,तथा,व,इसलिए।
उदाहरण
निम्न में से भिन्न प्रकृति का समुच्य बोधक है-
1. कि 2. क्योंकि 3. ताकि 4. परन्तु
उत्तर
इनमें 'कि' भिन्न है क्योंकि कि संयोजक है तथा बाकि तीनों विभाजक समुच्य बोधक है।
2. विभाजक - दो शब्दों या दो वाक्यों में अलगाव दिखाने वाले अव्यय विभाजक कहलाते है।
जैसे- या, अथवा, अन्यथा, परन्तु, अपितु, जबकि, किन्तु।
4. विस्मयादि बोधक अव्यय
इसमें भाव का बोध होना जरूरी है
जैसे - भय,डर,घृणा,शोक,हर्ष,खेद,कष्ट आदि भावों की अभिव्यक्ति करने वाले शब्द विस्मयादि बोधक अव्यय कहलाते हैं।
उदाहरण
निम्न में से इच्छा वाचक विस्मयादिबोधक अव्यय है-
1. उफ! 2. वाह! 3. हाय! 4. क्या!
उत्तर
इनमें 'हाय!' इच्छा वाचक है। और इस इच्छा वाचक अव्यय का प्रयोग सामान्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है उदाहरण के लिए 'हाय!' यह पर्स कितना अच्छा है। यहां पर हाय! से उनकी भावना उस पर्स को पाने कि इच्छा दर्शाती है।
5. निपास
किसी सामान्य कथन को बल देकर प्रस्तुत करने के लिए निपात का प्रयोग किया जाता है।
जैसे - ही,भी तो, तक आदि।
उदाहरण
तुम तो कल जयपुर जाने वाले थे।
यहां पर 'तो ' का प्रयोग वाक्य पर बल देने के लिए कहा गया है।
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अव्यय(अविकारी शब्द)
अव्यय(अविकारी शब्द)
वे शब्द जिनमें लिंग वचन कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता उन्हें अव्यय या अविकारी शब्द कहते हैंजैसे - कैसे,कहां,कितना।
उदाहरण
निम्न में से अविकारी शब्द है-
1. कौन 2. कब 2. किसने 4. यह
उत्तर
क्योंकि कौन प्र.व.सर्वनाम व एक वचन कर्ता है जिस पर लिंग, कारक व वचन बदलने पर परिवर्तन होता है कब एक अव्यय है जिस पर लिंग, वचन या कारक के बदलने पर कोई प्रभाव नहीं होगा इसी प्रकार किसने प्र.व.सर्वनाम एक वचन कर्ता है और यह अ.प.सर्वनाम एक वचन कर्ता है।
अव्यय के मुख्य रूप से चार भेद होते हैं -
क्रिया विशेषण
संबंध बोधक
समुच्चय बोधक
विस्मयादि बोधक
अन्य भेदों में निपात व अव्ययीभाव समास के उदाहरण है।
1. क्रिया विशेषण
क्रिया शब्दों कि विशेषता प्रकट करने वाले शब्द क्रिया विशेषण कहलाते है क्रिया विशेषण के मुख्यतः चार भेद होत है।
1. रीति वाचक क्रि.वि - कैसे
2. स्थान वाचक क्रि.वि. - कहां
3. काल वााचक क्रि.वि. - कब
4. परिमाण वाचक क्रि.वि. - कितना
रीति वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्नवाचक अव्यय कैसे का प्रयोग करने पर जो क्रिया विशेषण उत्तर में आये उसे रिति वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - सुन्दर, अच्छा, मीठा, धीरे-धीरे,तेज।
उदाहरण - हमारे सामने शेर अचानक आ गया
यहां कैसे से प्रश्न करने पर शेर हमारे सामने कैसे आ गया। इसका उत्तर अचानक जो कि आ गया क्रिया की विशेषता बतलाता है अतः अचानक अव्यय है।
स्थान वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्नवाचक अव्यय कहां का प्रयोग करने पर उत्तर में जो क्रिया विशेषण शब्द आए उसे स्थान वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - यहां,वहां,सामने,ऊपर,निचे,दाएं,बाएं।
उदाहरण - आज मैं वहां जाऊंगा।
यहां कहां से प्रश्न करने पर आज तुम कहां जाओगे। इसका उत्तर वहां जो कि जाऊंगा क्रिया की विशेषता बतलाता है अतः वहां अव्यय है।
काल वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पहले प्रश्नवाचक अव्यय कब का प्रयोग करने पर उत्तर में जो शब्द आये वह काल वाचक क्रिया विशेषण होता है।
जैसे - कल,परसों,आज,सुबह,शाम,पहले बाद में।
उदाहरण - मोहन कल हनुमानगढ़ आयेगा।
यहां कब से प्रशन करने पर मोहन कब हनुमानगढ़ जायेगा। इसका उत्तर कल जो कि जायेगा क्रिया कि विशेषता है। अतः कल अव्यय है।
परिमाण वाचक क्रि.वि.
क्रिया से पुर्व प्रश्न वाचक अव्यय कितना का प्रयोग करने पर जो शब्द उत्तर में आये उसे परिमाण वाचक क्रिया विशेषण माना जाता है।
जैसे - कम,ज्यादा,अधिक,बहुत,थोड़ा।
उदाहरण - राम ने भोजन थोड़ा खाया है।
यहां कितना से प्रश्न करने पर राम ने कितना भोजन खाया। इसका उत्तर थोड़ा जो कि खाया क्रिया कि विशेषता है। अतः थोड़ा अव्यय है।
तथ्य
बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका प्रयोग विशेषण तथा क्रिया विशेषण दोनों के लिए हो जाता है
जैसे - कम,ज्यादा,अधिक,बहुत,थोड़ा,आधा पुरा,सुन्दर,अच्छा मिठा।
इन शब्दों का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के लिए हो तो इन्हें विशेषण माना जायेगा, तथा इनका प्रयोग क्रिया के लिए हो तो इन्हें क्रिया विशेषण माना जायेगा।
उदाहरण
मोर सुन्दर नाचा। मोर सुन्दर है।
पहले वाक्य में सुन्दर क्रिया विशेषण है जो कि नाचा क्रिया कि विशेषता बता रहा है, जबकि दुसरे वाक्य में सुन्दर विशेषण है जो कि मोर कि विशेषता बता रहा है।
जैसे वह आम कम(क्रि.वि.) खाता है। वह कम(वि.) आम खाता है।
जिस प्रकार विशेषण शब्दों की विशेषता प्रविशेषण कहलाती है उसी प्रकार क्रिया विशेषण शब्दों कि विशेषता प्रक्रियाविशेषण कहलाती है।
उदाहरण
उदाहरण मोर बहुत सुन्दर है। मोर बहुत सुन्दर नाचा।
यहां पहले वाक्य में बहुत, सुन्दर विशेषण कि विशेषत बता रहा है। अतः यह प्रविशेषण है। दुसरे वाक्य में बहुत, सुन्दर क्रियाविशेषण कि विशेषता बता रहा है। अतः यह प्रक्रियाविशेषण है।
2. संबंध बोधक अव्यय
वे अव्यय शब्द जिनका प्रयोग वाक्य में वाक्य में प्रयुक्त क्रिया या अन्य शब्दों के साथ जोड़ने के लिए किया जाता है। उन्हें संबंध बोधक कहते है।
बहुत से शब्दों का प्रयोग क्रिया वि. तथा संबंध बोधक दोनों में होता है। जैसे यहां, वहां, ऊपर, निचे, सामने, पहले, दायें, बाएं, बाद, कम, ज्यादा,अधिक बहुत आदि।इन शब्दों से पहले कारक चिन्ह का,के,कि,रा,रे,री,ना,ने,नी,से आ जाये तो इन्हें संबंध बोधक अव्यय माना जायेगा। तथा इनसे पहले ये कारक चिन्ह न आये तो इन्हें क्रि.वि. माना जायेगा।
जैसे - राम बाद में जायेगा।
यहां बाद क्रिया विशेषण है।
राम भोजन के बाद जायेगा।
यहां बाद संबंध बता रहा है।
3. समुच्य बोधक अव्यय
दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने या उनमें अलगाव(अलग होना) दिखाने वाले अव्यय समुच्च बोधक अव्यय कहलाते है।
ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं -
संयोजक
विभाजक
1. संयोजक - दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाले अव्यय संयोजक कहलाते है।
जैसे - कि,और,एवं,तथा,व,इसलिए।
उदाहरण
निम्न में से भिन्न प्रकृति का समुच्य बोधक है-
1. कि 2. क्योंकि 3. ताकि 4. परन्तु
उत्तर
इनमें 'कि' भिन्न है क्योंकि कि संयोजक है तथा बाकि तीनों विभाजक समुच्य बोधक है।
2. विभाजक - दो शब्दों या दो वाक्यों में अलगाव दिखाने वाले अव्यय विभाजक कहलाते है।
जैसे- या, अथवा, अन्यथा, परन्तु, अपितु, जबकि, किन्तु।
4. विस्मयादि बोधक अव्यय
इसमें भाव का बोध होना जरूरी है
जैसे - भय,डर,घृणा,शोक,हर्ष,खेद,कष्ट आदि भावों की अभिव्यक्ति करने वाले शब्द विस्मयादि बोधक अव्यय कहलाते हैं।
उदाहरण
निम्न में से इच्छा वाचक विस्मयादिबोधक अव्यय है-
1. उफ! 2. वाह! 3. हाय! 4. क्या!
उत्तर
इनमें 'हाय!' इच्छा वाचक है। और इस इच्छा वाचक अव्यय का प्रयोग सामान्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है उदाहरण के लिए 'हाय!' यह पर्स कितना अच्छा है। यहां पर हाय! से उनकी भावना उस पर्स को पाने कि इच्छा दर्शाती है।
5. निपास
किसी सामान्य कथन को बल देकर प्रस्तुत करने के लिए निपात का प्रयोग किया जाता है।
जैसे - ही,भी तो, तक आदि।
उदाहरण
तुम तो कल जयपुर जाने वाले थे।
यहां पर 'तो ' का प्रयोग वाक्य पर बल देने के लिए कहा गया है।
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